यूँ जो तुम मुझसे नज़रें मिला नहीं पा रहे,
क्यों उधार की जिंदगी बिता नहीं पा रहे?
मेरे पैसों पे ऐश कर, मुझे ही ठुकरा रहे हो,
मुश्किल में जो साथ दिया, उसे ही भुला रहे हो।
चंद रुपये किसी और के रख, आखिर क्या कर लोगे?
आज नहीं तो कल जो आएगी, वो तकलीफ कैसे झेल लोगे?
मेरी गली और मोहल्ला तो तुमने छोड़ दिया,
क्या मेरे दिए पैसों ने, तुम्हारा रास्ता भटका दिया?
'भैया-भैया' कह कर तुमने अपना काम निकाल लिया,
अब पैसे देने के वक़्त, फोन उठाना भी छोड़ दिया।
सर झुका कर जो तुम चुपचाप गुज़रते हो,
क्या अपने सम्मान को चंद पैसों से नीचे रखते हो?
बददुआ तो कोई दिल से देता नहीं,
पर ऊपर वाले के न्याय से, कोई बच पाता नहीं।
काम निकलने के बाद, अक्सर भूल जाते हैं सब,
पर उधार पर जीने वालों का, भला होता नहीं बेशक।
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