प्यार था या पागलपन,
बस उसे देखते रहना चाहता था।
पीछा करता, टुक-टुक ताकता,
बस उसके करीब रहना चाहता था।
उसे देखने के बहाने ही,
मेरी हाजिरी शत-प्रतिशत रहती।
वो भी कभी नागा नहीं करती,
इसलिए मुझे क्लास जाना लगता था ज़रूरी।
उसके बैठने के स्थान के पास ही,
मेरा स्थान भी सुरक्षित रहता था।
कहीं वो आगे-पीछे बैठ जाए तो,
उस दिन मेरा मन उदास रहता था।
बात करने की हर कोशिश मेरी,
नाकामियों की सीढ़ी चढ़ रही थी।
बात करता भी तो भला कैसे,
उसके सामने मेरी आवाज़ ही नहीं निकलती थी।
घर से मैं जल्दी निकल पड़ता,
उसके राह पर पहले से तैयार रहता।
अकेले में मिल कुछ कह-सुन सकूँ,
इसी उम्मीद में हर रोज़ था जीता।
दोस्तों के बीच उसकी बातें छेड़ता,
फिर सब मुझे उसके नाम से चिढ़ाने लगे।
जिसे मेरे दोस्त 'भाभी' कहते थे,
उसे हम और भी शिद्दत से लुभाने लगे।
पता नहीं क्यों, पर आखिरी क्लास तक,
उसे मैं अपने दिल की बात सुना न सका।
नंबर माँगने के वक़्त भी,
मेरे मुँह से कोई सही सवाल निकल न सका।
मेरा एकतरफा प्यार ही सही,
पर उसे भी कुछ तो एहसास हुआ होगा।
मेरा प्यार भरा पागलपन न सही,
उसे मेरा, अपने प्रति लगाव तो दिखा होगा।
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